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Rahim Ke Dohe In Hindi for class 7 and 9 students

Rahim Ke Dohe: Friends, today we have written Rahim Ke Dohe for class 7 and 9 students. Rahim Das Ji was a great medieval poet, he had good knowledge of Awadhi, Braj, Arabic, Persian, Turkish, and Hindi languages. If you like it, do not forget to share it with your friends.

Rahim was a poet of medieval feudal culture. Rahim Das was born on 17 December 1556 in Lahore, Pakistan. Rahim’s personality was multifaceted. He was simultaneously a commander, administrator, patron, donor, diplomat, polyglot, art lover, poet and scholar.

रहीम मध्यकालीन सामंतवादी संस्कृति के प्रेमी कवि थे। रहीम का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न था। वे एक ही साथ सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, कवि एवं विद्वान थे। रहीम सांप्रदायिक सदभाव तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक थे। रहीम कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे।

Rahim Ke Dohe Class 7

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।।1 ।।

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाँड़ति छोह।।2 ।।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियत न पान।
कहि रहीम परकाज हित, संपति-सचहिं सुजान।।3 ।।

थोथे बादर क्वार के, ज्यों रहीम घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात।।4 ।।

धरती की-सी रीत है, सीत घाम औ मेह।
जैसी परे सो सहि रहे, त्यों रहीम यह देह।।5 ।।

Rahim Ke Dohe Class 9

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ॥

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहै कोय ॥

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय ॥

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस ॥

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं ॥

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय ॥

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन देत समेत।
तेरहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ॥

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथेन माखन होय ॥

रहिमन देखि बड़ेन को, लघुन दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि ॥

रहिमन निज संपति बिन, कौन बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय ॥

रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून ॥

Conclusion:

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