Shayari

Best 50+ Mirza Ghalib Shayari in Hindi

हेलो दोस्तों आज हमने आपके लिए Mirza Ghalib Shayari in Hindi यानी की हिंदी में मिर्जा गालिब की शायरी लिखे हैं जीने आप हमारीसाइट पर आकर पढ़ सकते हैं

स्वागत है आप सभी का हमारी वेबसाइट साइट Yourhindi.net में और आज इसके अन्दर हम आपको बताने वाले हैं दुनिया के सबसे बढ़िया Mirza Ghalib ji Shayari जो कि बहुत ही ज़्यादा मज़ेदार होगे क्योकि इनकी लेंथ बहुत ज़्यादा बड़ी होने वाली आप सभी का दिल से दोबारा स्वागत करते हैं।

मिर्जा गालिब जी जीवन सारांश

कलम का नाम: ‘ग़ालिब’

असली नाम: मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान

जन्म: 27 दिसंबर 1797 | आगरा, उत्तर प्रदे श

निधन: 15 फरवरी 1869 | दिल्ली, भारत


मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान (1797-1869) जिन्होंने ग़ालिब को चुनने से पहले असद के नामांकित पद के साथ लिखा था, जिसका शाब्दिक अर्थ है अति करना या प्रबलता, ऐबक तुर्क के एक मध्य एशियाई परिवार से सत्कार किया गया, जिसने सिपाही के रूप में पारंपरिक सेवा की।

अपने दादा के विपरीत जो सेना में शामिल होने के लिए साह आलम द्वितीय के शासनकाल के दौरान भारत में चले गए थे और उनके पिता, जो एक ही पेशे का पालन करते थे और अलवर में सेना की कार्रवाई में मारे गए थे, गालिब ने एक कवि, समर्थक लेखक, डायरीकार, और के रूप में शानदार प्रदर्शन किया बेहद अंतरंग पत्रों के लेखक। उनका जन्म आगरा में हुआ था, जहाँ परिवार बस गया था।

उन्होंने पांच साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था और उनके चाचा ने उनका लालन-पालन किया था, जो चार साल बाद निधन हो गया था, जिसके बाद उनके नाना द्वारा देखभाल की गई थी।

तेरह वर्ष की आयु में विवाहित होने के बाद, वह दिल्ली चले गए, जहाँ उन्होंने अपने निवास स्थान को किरायेदार के रूप में स्थानांतरित कर दिया, जिसे अब पुरानी दिल्ली के रूप में जाना जाता है, जब तक वह बसते नहीं हैं तब तक बल्लीमारन नामक एक इलाके में एक और किराए के आवास में उनकी मृत्यु हो गई। दर्द और दर्द।

कम वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध होने के कारण, ग़ालिब को अपने जीवन के शुरुआती हिस्से में कठिनाई का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें कभी भी ऐसा करना पड़ा था।

वह मुख्य रूप से अपने चाचा के राज्य से पेंशन पर कायम था, लेकिन यह दोनों विज्ञापन अनियमित था, जैसा कि वह बड़प्पन से प्राप्त सहायता था। ब्रिटिश सरकार के सभी संभावित अधिकारियों के साथ-साथ कलकत्ता की उनकी यात्रा को उनके मामले को व्यक्तिगत रूप से पेश करने की उनकी दलील उन्हें व्यक्तिगत वित्तीय सुरक्षा नहीं देती थी।

वह एक अद्वितीय व्यक्ति थे, जिन्होंने उर्दू और फ़ारसी में बेहतरीन तरह की कविता लिखी, शतरंज और पासा खेला, किताबें उधार लीं, कर्ज लिया, लगातार शराब पी, मानदंडों का उल्लंघन किया और कारावास से दंडित हुए लेकिन अपने शिष्टाचार के साथ।

हालाँकि ग़ालिब ने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन उन्होंने मुल्ला अब्दुस्समद से अरबी, फ़ारसी, तर्क और दर्शन में अपने सबक सीखे और बौद्धिक स्तर पर अपने आप बढ़े।

शेख इब्राहिम ज़ौक के निधन के बाद, जिन्हें उनकी कविता पर सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की काउंसलिंग करने का सौभाग्य मिला, उन्हें उनके गुरु के रूप में नियुक्त किया गया, साथ ही साथ मुगल दरबार का इतिहासकार भी था, जो उन्हें कुछ वित्तीय सुरक्षा और नजमुददुल्लाह के सम्मान में लाया गया था , दबीरुलमुल्क, और निज़ाम जंग, साथ ही मिर्ज़ा नौशा की उपाधि।

ग़ालिब अपनी शानदार बुद्धि और कठिन कशमकश के लिए खड़े हैं, साथ ही साथ तकनीक और डिक्शन में उनके नवाचारों ने उनकी कविता और गद्य को उनके पहले या बाद में लिखे गए अन्य सभी से अलग किया है।

कई स्तरों पर जीवन के साथ अनिश्चित काल तक, वह बीमारी में मर गया और उसे निज़ामुद्दीन में दफनाया गया, जो दिल्ली के शहर से परे था ।

उनकी कई रचनाएँ, उर्दू में उनके दीवान और पत्रों के अलावा और फ़ारसी कविता और गद्य की कुल्लियात में शामिल हैं, उर्दू-ए-मुल्ला, एक संग्रह का संग्रह, ताई-ए-तैज, एक साहित्यिक कार्य का खंडन; क़ता-ए-बुरहान, फ़ारसी लेक्सिकॉन की आलोचना; पंज आहंग, सामयिक लेखन का संग्रह; मेहेर नीम रोजे, एक ऐतिहासिक कथा; और दास्तानुम्बो,1857 का एक साहित्यिक खाता जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा और दुर्लभ कलात्मक योग्यता की गवाही देता है।

Mirza Ghalib Shayari In Hindi 2 Lines

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं…..

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के……….

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है………..

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले…..

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले………

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना…….

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता……..

निस्यह-ओ-नक़्द-ए-दो-आलम की हक़ीक़त मालूम
ले लिया मुझ से मिरी हिम्मत-ए-आली ने मुझे

मुँह न दिखलावे न दिखला पर ब-अंदाज़-ए-इताब
खोल कर पर्दा ज़रा आँखें ही दिखला दे मुझे

लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
मैं हूँ वो क़तरा-ए-शबनम कि हो ख़ार-ए-बयाबाँ पर

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़!

साबित हुआ है गर्दन-ए-मीना पे ख़ून-ए-ख़ल्क़
लरज़े है मौज-ए-मय तिरी रफ़्तार देख कर

यूसुफ़ उस को कहो और कुछ न कहे ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लाइक़-ए-ताज़ीर भी था

मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
तू और एक वो ना-शुनीदन कि क्या कहूँ

नश्शा-ए-रंग से है वाशुद-ए-गुल
मस्त कब बंद-ए-क़बा बाँधते हैं

नश्शा-ए-रंग से है वाशुद-ए-गुल
मस्त कब बंद-ए-क़बा बाँधते हैं

शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम
लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं

ज़ोफ़ से गिर्या मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना

न बंधे तिश्नगी-ए-ज़ौक़ के मज़मूँ ‘ग़ालिब’
गरचे दिल खोल के दरिया को भी साहिल बाँधा

क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बे-दाद कि हम
आप उठा लेते हैं गर तीर ख़ता होता है ………

मैं ने जुनूँ से की जो ‘असद’ इल्तिमास-ए-रंग
ख़ून-ए-जिगर में एक ही ग़ोता दिया मुझे ………

है मुश्तमिल नुमूद-ए-सुवर पर वजूद-ए-बहर
याँ क्या धरा है क़तरा ओ मौज-ओ-हबाब में ………

हाँ अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़्त
देखा कि वो मिलता नहीं अपने ही को खो आए ………

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ ………

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव ………

इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं
पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की ………

क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन
हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं ………

रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
अक़्ल कहती है कि वो बे-मेहर किस का आश्ना ………

मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना ………

हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर जवाँ था अभी आरिफ़
क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और ………

है पर-ए-सरहद-ए-इदराक से अपना मसजूद
क़िबले को अहल-ए-नज़र क़िबला-नुमा कहते हैं………

बे-पर्दा सू-ए-वादी-ए-मजनूँ गुज़र न कर
हर ज़र्रा के नक़ाब में दिल बे-क़रार है ………

गंजीना-ए-मअ’नी का तिलिस्म उस को समझिए
जो लफ़्ज़ कि ‘ग़ालिब’ मिरे अशआर में आवे ………

दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया
मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए ………

काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब
इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे ………

काम उस से आ पड़ा है कि जिस का जहान में
लेवे न कोई नाम सितम-गर कहे बग़ैर ………

Mirza Ghalib Shayari on love in hindi

जल्वे का तेरे वो आलम है कि गर कीजे ख़याल
दीदा-ए-दिल को ज़ियारत-गाह-ए-हैरानी करे………

की उस ने गर्म सीना-ए-अहल-ए-हवस में जा
आवे न क्यूँ पसंद कि ठंडा मकान है ………

लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हनूज़
लेकिन यही कि रफ़्त गया और बूद था ………

तू और आराइश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं और अंदेशा-हा-ए-दूर-दराज़ ………

हर बुल-हवस ने हुस्न-परस्ती शिआ’र की
अब आबरू-ए-शेवा-ए-अहल-ए-नज़र गई ………

मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
दशना इक तेज़ सा होता मिरे ग़म-ख़्वार के पास ………

फ़र्दा-ओ-दी का तफ़रक़ा यक बार मिट गया
कल तुम गए कि हम पे क़यामत गुज़र गई ………

गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़
पर हम ऐसे खोए जाते हैं कि वो पा जाए है ………

नाकामी-ए-निगाह है बर्क़-ए-नज़ारा-सोज़
तू वो नहीं कि तुझ को तमाशा करे कोई ………

ख़ुदा शरमाए हाथों को कि रखते हैं कशाकश में
कभी मेरे गरेबाँ को कभी जानाँ के दामन को ………

हैं आज क्यूँ ज़लील कि कल तक न थी पसंद
गुस्ताख़ी-ए-फ़रिश्ता हमारी जनाब में ………

ताअत में ता रहे न मय-ओ-अँगबीं की लाग
दोज़ख़ में डाल दो कोई ले कर बहिश्त को ………

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
सो रहता है ब-अंदाज़-ए-चकीदन सर-निगूँ वो भी ………

वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ
हम को हरीस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार देख कर ………

साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर
तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे ………

सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
वो इक गुल-दस्ता है हम बे-ख़ुदों के ताक़-ए-निस्याँ का ………

सर पा-ए-ख़ुम पे चाहिए हंगाम-ए-बे-ख़ुदी
रू सू-ए-क़िबला वक़्त-ए-मुनाजात चाहिए ………

काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त ………

पी जिस क़दर मिले शब-ए-महताब में शराब
इस बलग़मी-मिज़ाज को गर्मी ही रास है ………

ने तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में
गोशे में क़फ़स के मुझे आराम बहुत है ………

समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिए ………

गिरनी थी हम पे बर्क़-ए-तजल्ली न तूर पर
देते हैं बादा ज़र्फ़-ए-क़दह-ख़्वार देख क………

हवस-ए-गुल के तसव्वुर में भी खटका न रहा
अजब आराम दिया बे-पर-ओ-बाली ने मुझे ………

वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
तुम ने क्यूँ सौंपी है मेरे घर की दरबानी मुझे ………

फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मेरे आगे ………

पूछे है क्या वजूद ओ अदम अहल-ए-शौक़ का
आप अपनी आग के ख़स-ओ-ख़ाशाक हो गए ………

मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
सिवाए ख़ून-ए-जिगर सो जिगर में ख़ाक नहीं ………

विदाअ ओ वस्ल में हैं लज़्ज़तें जुदागाना
हज़ार बार तू जा सद-हज़ार बार आ जा ………

मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को क्या करूँ
माना कि तेरे रुख़ से निगह कामयाब है ………

ऐ नवा-साज़-ए-तमाशा सर-ब-कफ़ जलता हूँ मैं
इक तरफ़ जलता है दिल और इक तरफ़ जलता हूँ मैं ………

तिरे जवाहिर-ए-तरफ़-ए-कुलह को क्या देखें
हम औज-ए-ताला-ए-लाला-ओ-गुहर को देखते हैं ………

न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़
मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़ ………

है गै़ब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद
हैं ख़्वाब में हुनूज़ जो जागे हैं ख़्वाब में ………

वफ़ा-दारी ब-शर्त-ए-उस्तुवारी अस्ल ईमाँ है
मरे बुत-ख़ाने में तो काबे में गाड़ो बिरहमन को ………

है तमाशा-गाह-ए-सोज़-ए-ताज़ा हर यक उज़्व-ए-तन
जूँ चराग़ान-ए-दिवाली सफ़-ब-सफ़ जलता हूँ मैं ………

कम नहीं जल्वागरी में, तिरे कूचे से बहिश्त
यही नक़्शा है वले इस क़दर आबाद नहीं ………

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से
मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबाँ मुझ से ………

हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन ………

जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिए
सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का ………

रहमत अगर क़ुबूल करे क्या बईद है
शर्मिंदगी से उज़्र न करना गुनाह का ………

है काएनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से
परतव से आफ़्ताब के ज़र्रे में जान है ………

जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलम
मैं मो’तक़िद-ए-फ़ित्ना-ए-महशर न हुआ था ………

चाहते हैं ख़ूब-रूयों को ‘असद’
आप की सूरत तो देखा चाहिए ………

रखियो ‘ग़ालिब’ मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआफ़
आज कुछ दर्द मिरे दिल में सिवा होता है ………

गुंजाइश-ए-अदावत-ए-अग़्यार यक तरफ़
याँ दिल में ज़ोफ़ से हवस-ए-यार भी नहीं ………

मैं ने कहा कि बज़्म-ए-नाज़ चाहिए ग़ैर से तिही
सुन के सितम-ज़रीफ़ ने मुझ को उठा दिया कि यूँ ………

शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश
सहरा में ऐ ख़ुदा कोई दीवार भी नहीं ………

देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है
मैं उसे देखूँ भला कब मुझ से देखा जाए है ………

ज़बाँ पे बार-ए-ख़ुदाया ये किस का नाम आया
कि मेरे नुत्क़ ने बोसे मिरी ज़बाँ के लिए ………

पिन्हाँ था दाम-ए-सख़्त क़रीब आशियान के
उड़ने न पाए थे कि गिरफ़्तार हम हुए ………

रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे
ने हाथ बाग पर है न पा है रिकाब में ………

रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दम
धोए धब्बे जामा-ए-एहराम के ………

सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसा बग़ैर इल्तिजा किए ………

मुज़्महिल हो गए क़वा ग़ालिब
वो अनासिर में ए’तिदाल कहाँ ………

ग़लती-हा-ए-मज़ामीं मत पूछ
लोग नाले को रसा बाँधते हैं ………

हमारे शेर हैं अब सिर्फ़ दिल-लगी के ‘असद’
खुला कि फ़ाएदा अर्ज़-ए-हुनर में ख़ाक नहीं ………

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र ‘ग़ालिब’
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाए है मुझ से ………

सीखे हैं मह-रुख़ों के लिए हम मुसव्वरी
तक़रीब कुछ तो बहर-ए-मुलाक़ात चाहिए ………

नज़र लगे न कहीं उस के दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं ………

है ख़याल-ए-हुस्न में हुस्न-ए-अमल का सा ख़याल
ख़ुल्द का इक दर है मेरी गोर के अंदर खुला………

ज़ोफ़ में तअना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ ………


Mirza Ghalib Shayari with meaning in hindi

ग़ैर को या रब वो क्यूँकर मन-ए-गुस्ताख़ी करे
गर हया भी उस को आती है तो शरमा जाए है ………

रहे न जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजे
कटे ज़बान तो ख़ंजर को मरहबा कहिए ………

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना
है यूँ कि मुझे दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत है ………

मरते मरते देखने की आरज़ू रह जाएगी
वाए नाकामी कि उस काफ़िर का ख़ंजर तेज़ है ………

शेर ‘ग़ालिब’ का नहीं वही ये तस्लीम मगर
ब-ख़ुदा तुम ही बता दो नहीं लगता इल्हाम ………

हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझाएँगे क्या ………

नज़्ज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का
मस्ती से हर निगह तिरे रुख़ पर बिखर गई ………

तमाशा कि ऐ महव-ए-आईना-दारी
तुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं ………

दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई
इक शम्अ रह गई है सो वो भी ख़मोश है ………

ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’
वाक़िआ सख़्त है और जान अज़ीज़ ………

दोनों जहान दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
याँ आ पड़ी ये शर्म कि तकरार क्या करें ………

ढाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगी
मैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वजूद था ………

अहल-ए-बीनश को है तूफ़ान-ए-हवादिस मकतब
लुत्मा-ए-मौज कम अज़ सैली-ए-उस्ताद नहीं ………

है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त ‘असद’
हम ने ये माना कि दिल्ली में रहें खावेंगे क्या ………

हर इक मकान को है मकीं से शरफ़ ‘असद’
मजनूँ जो मर गया है तो जंगल उदास है ………

कौन है जो नहीं है हाजत-मंद
किस की हाजत रवा करे कोई ………

करे है क़त्ल लगावट में तेरा रो देना
तिरी तरह कोई तेग़-ए-निगह को आब तो दे ………

मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ
वो सितमगर मिरे मरने पे भी राज़ी न हुआ………

ख़ुदाया जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है
कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाए है मुझ से ………

हूँ गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
वर्ना बाक़ी है ताक़त-ए-परवाज़ ………

लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और ………

गर किया नासेह ने हम को क़ैद अच्छा यूँ सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छुट जावेंगे क्या………

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं…….

मिसाल ये मिरी कोशिश की है कि मुर्ग़-ए-असीर
करे क़फ़स में फ़राहम ख़स आशियाँ के लिए…..

अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही……

आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब’
कोई दिन और भी जिए होते……

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना ‘ग़ालिब’
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ’द…….

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था……

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे…..

आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता
तुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है…..

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का……

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती….

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक….

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं…….

आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या…..

समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिए ………

कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ……

Conclusion:

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