Hindi Poems

Best 30+ Hindi poems on Nature

हेलो दोस्तों आज हमने आपके लिए Hindi poems on Nature यानी की प्रकृति पर हिंदी कविताएँ लिखे हैं जीने आप हमारीसाइट पर आकर पढ़ सकते हैं

स्वागत है आप सभी का हमारी वेबसाइट साइट shayarireaders.in में और आज इसके अन्दर हम आपको बताने वाले हैं सबसे बढ़िया प्रकृति पर हिंदी कविताएँ मे जो कि बहुत ही ज़्यादा मज़ेदार होगे क्योकि इनकी लेंथ बहुत ज़्यादा बड़ी होने वाली आप सभी का दिल से दोबारा स्वागत करते हैं।

Hindi poems on Nature

Hindi poems on Nature

मैं बादल बन जाऊँ
कितना ही अच्छा हो
यदि मैं बादल बन जाऊँ
नीले ,नीले आसमान में
इधर-उधर मंडराऊँ
जब भी देखूं सूखी धरती
झट पिघलत्र मैं जाऊँ
गर्मी से तंग लोगों को

जहाँ कहीं भी धूप सताती,
उसके नीचे झट सुस्ताते!
जहाँ कहीं वर्षा हो जाती,
उसके नीचे हम चिप जाते!


सुन्दर रूप इस धर का,
ऑँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद स्रूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरने| से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखयती मंद-मंद मुस्कान 


चिड़ियों से है उड़ना सीखा, हर
तितली से इठलाना। है.
अंदररों की ग्ुंजन से सीरठा,
राग मधुरतम गाना।
तेज लिया सूरज से हमने,
चांद से शीतल छाया।
टिम-टिम करते तारों की,
हम समझ गए सब् माया
‘सगर ने सिखलाई हमको,
गहरी सोच की धारा।
गगनचुम्डी पर्वत से सीखा,
हो ऊंचा लक्ष्य हमारा।
समय की टिक्र-टिक ने समझाया,
सका ही चलते रहना
मुश्किल कितनी आन पड़े,
पर कभी न धीरज खोन। छे
प्रकृति के कण-कण में है,
सुंढर संदेश समाया
ईश्वर ने इसके क्वारा ज्यों,
अपना रूप दिखाया॥


मल करो खिलवाड़ प्रकुतिशे॥
रुक जाओ अभी भी समय हैं
अगर आज नहीं रुके तो
कल बर्बाद कर देंगें हम
जाने अंजाने प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं हम ….


निरुत्तर मै था नही,
कर दिया हालात ने
संग अपने जो किया,
वह किया अवसाद में
प्रेम का यह पुष्प
अर्पित तुम में है संगिनी बस मुझे याद रखना प्रिय मेरे बाद में



पहाड़ों के जिस्मों पे ब्फ़ों की चादर
विनाहों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के जेवर
है कश्मीर धरती पे जब्लत का मंजर


सुन्दर रूप इस धर का,
ऑचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद स्रुर्ज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरने से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखयती मंद-मंद मुस्कान


वरदियों के करत वो गढ़ ओ उ ए वा! का इते
जाए जाह के धर्गाँ आ का के एव हैं परे बे
ता था गृह गई तो ज खर्जी पेती का ती
मतों ए फ़ि झत् क गा छेड़ा की ढुए भी बाते
अच्छी गा कर मे की है पी वध पे छोड़ा वा है
वे है ते फिर! के गरों ए अक्तो में पु जता है
हू प्रति आप कक खत बढ़ बढ़ किले है
मगर 3फ केश मित्र का रोग यूढ़ फ्ते है


भूमि , धरती , भू , धरा ,
तेरे हैं ये कितने नाम ,
तू थी रंग- बिरंगी ,
फल फूलों से भरी – भरी ,
तूने हम पर उपकार किया ,
हमने बदले में कया दिया ?
तुझसे तेरा रूप है छीना ,
तुझसे तेरे रंग हैं छीने ,
पर अब मानव है जाग गया ,
हमने तुझसे ये वादा किया ,
अब ना जंगल काटेंगे ,
नदियों को साफ़ रखेंगे ,
लाँटा देंगे तेरा रंग रूप ,
चाहे हो कितनी बारिश और धूप |


ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
हवाओ की सरसराहट
ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट
समुन्दर की लहरों का शोर
ये बारिश में नाचते सुंदर मोर
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
खुबसूरत चांदनी रात
ये तारों की झिलमिलाती बरसात
खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल
ये उड़ते हुए धुल
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
नदियों की कलकल
ये मौसम की हलचल
पर्वत की चोटियाँ
येझींगुर की सीटियाँ
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे


प्रिय चिरन्तर है सजनि!
प्रिय चिरन्तर है. सजनि
क्षण क्षण नवीन सुहागिनी मैं!
श्वास में मुझको छिपाकर वह असीम विशाल चिर घन,
शून्य में जब छा गया उसकी सजीली साध सा-बन,
छिप कहाँ उसमें सकी
बुझ बुझ जली चल दामिनी मैं!
छाँह को उसकी सजनि नव आवरण अपना बनाकर,
धूलि में निज अश्रु बोने में पहर सूने बिताकर,
प्रात में हँस छिप गई
ले छलकते दृग यामिनी मैं!


मिलन-मन्दिर में उठा दूँ जो सुमुख से सजल गुण्ठन,
मैं मिदूँ प्रिय में मिटा ज्यों तप्त सिकता में सलिल-कण
नभ से मोतियों, का झरना, टिप टिप होले से बरसे।
वर्षा की बूंदों का एहसास, प्यासी पृथ्वी कब से तरसे।।
भमि पर जल पड़ते ही, मिट॒टी की फैलें सरभि अनपम।
पानी से हो पनीत ‘मानस’, दिखे निसर्ग कितना हरितम,


पक्षी और बादल
ये भगबान के डाकिये हैं
जो एक महादेश से
दूपरे महादेश को जाते हैं।
हम तो समझ नहीं पाते हैं
मगर उनकी ल्लाई चिह्नियाँ
पेड, पौधे, पानी और पहाड़
बाँचते हैं


हम तो केबल यह आँकते हैं
कि एक देश की धरती
दूपरे देश को सुगंध भेजती है।
और बह पौरभ हबा में तैरते हुए
पक्षियों की पाँखो पर तिरता है।
और एक देश का भ्राप
और दूसरे देश में पानी
बनकर गिरता है।


बादल राजा, बादल राजा |
जल्दी से पानी बरसा जा।
नन्हे मुन्ने झुलस रहे हैं।
धरती की तू प्यास बूझा जा ।
जल्दी से पानी बरसा जा।


मोर
गहह मोर का सबको भाता,
जब वह पंखो को फैलाता,
कुँह-कुँह का शोर मचाता,
घूम-घूम कर नाच दिखाता।


1. नींद में सपना बन अज्ञात!
गुदगुदा जाते हो जब प्राण,
ज्ञात होता हँसने का अर्थ
तभी तो पाती हूं यह जान,
प्रधम छूकर किरणों की छाँह
मुस्कुराती कलियाँ बयों प्रात,
समीरण का छूकर चल्न छोर
लोटते क्यों हँस हैस कर पात!
प्रधम जब धर जातीं चुप चाप
मोतियों से आँखें नादान
आँकती तब आँसू का मोल
तभी तो आ जाता यह ध्यान,


जाती पगडंडी यह वन को
खींच लिये जाती है मन को
शुभ्र-धवल कुछ-कुछ मटमैली
अपने में सिमटी, पर, फैली |
चली गई है खोई-खोई
पत्तों की मह-मह से धोई
फूलों के रंगों में छिप कर,
कहीं दूर जाकर यह सोई!
उदित चंद्र बादल भी छाए।
किरणों के रथ के रथ आए।
पर, यह तो अपने में खोई
कहीं दूर जाकर यह जागी,
कहीं दूर जाकर यह सोई |
हरी घनी कोई वनखंडी
उस तक चली गई पगडंडी |


आ रही रवि की सवारी!
नव किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी!
आ रही रवि की सवारी!
विहग बंदी और चारण,
गा रहे हैं कीर्ति गायन,
छोड़कर मैदान भागी तारकों की फौज सारी!
आ रही रवि की सवारी!
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खड़ा है राह में बनकर भिखारी!
आ रही रवि की सवारी


कोयलों ने क्‍यों पसंद किया
हमारा ही पेड़?
बुलबुलें हर मौसम में
क्यों इसी पर बैठी रहती हैं?
क्यों गौरियों के बच्चे हो रहे हैं
बेशुमार?
क्यों गिलहरी को इसपर से उतरकर
छत पर चक्कर काटना अच्छा लगता है?
क्यों गिरगिट सोया रहता है यहाँ?
शायद इन मुफ्त के किराएदारों को
हमारा पड़ोस अच्छा लगता है
वे देखते होंगे कि दो बूढ़े टिके हैं यहाँ।
आख़िर इन दिनों में कोई ख़ासियत तो होगी ही
जो इतनी वर्षों से
कुर्सियाँ डालकर बैठते रहे हैं पास-पास |



तितली रानी इतने सुंदर
पंख कहा से लाइ हो।
क्या तुम कोई शहजादी हो
या परी लोक से आई हो।।
फूल तुम्हे भी अच्छे लगते
फूल हमें भी भाते है
जो तुम्हें कैसे लगते हैं
जो फूल तोड़ ले जाते है।।


so जब-जब कंठ करे ध्वनि
प्रणिता हो सत्य ज्योति
से बात झूठ कौन समक्ष
उसके सत्य सर्वोपरि सर्वात


हजारों गुल, हजारों गुल-बदन तूने बना डाले
कोई मिट्टी से ऐसे गुल खिला सकता है and क्‍या कुदरत

-नजीर अकबराबादी


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प्रकृति का महत्व

प्रकृति हमारे जीवन के लिए आवश्यक है – हमारी प्लेटों पर भोजन से लेकर कपड़े पहनने तक, दवाओं से लेकर मानसिक स्वास्थ्य लाभ तक। Hindi poems of nature.

प्रकृति ने मनुष्यों को कई लाभ दिए हैं। जिस हवा से हम सांस लेते हैं, जो पानी हम पीते हैं, और जो खाना हम खाते हैं, उससे प्रकृति हमारी बेहतरी को बढ़ाती है और हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी चीजें प्रदान करती है।

Mother Nature – Hindi poems on Nature

We have a premium and precious from God to live life on earth. Mother Nature makes our living easy by all resources we need today or the future. [Hindi poems on Nature] So for this precious gift from mother nature, So we should thank nature and Earth.

If we sit in the garden peacefully in the morning, then we can enjoy the sweet voice and beauty of nature. Our nature is adorned with a lot of natural beauty, which we can enjoy at any time. [Hindi poems on Nature] Earth possesses geographical beauty and is also called paradise or garden of cities.

But it is said that this beautiful gift given by God to human beings is continuously deteriorating due to the increasing technological advancement and ignorance of mankind.[Hindi poems on Nature]

Nature is like our real mother who never harms us but takes care of us. Walking in the lap of nature early in the morning makes us healthy and strong and also keeps us away from many fatal diseases like diabetes, permanent heart attack, high blood pressure, liver problems, digestive problems, infections, brain problems etc. is.

But It is good for our health that we hear the sweet sounds of birds, the tinkling of the low wind, the fury of fresh air, the sound of a flowing river, etc. in the morning. Most poets, writers, and people can be seen doing yoga and meditation in gardens to re-energize their mind, body, and soul.

Nature is an important and inseparable part of everyone’s life. We are all blessed by the true love of God in the form of beautiful nature.

The happiness of nature should never be lost. The most favourite subject of the work of many famous poets, writers, painters, and artists is nature.

Mother nature is the most amazing because artwork made by God which he has given as a valuable gift.

Nature is everything that is around us like water, air, land, trees, forest, mountains, rivers, sun, moon, sky, sea, etc.

Earth is filled with innumerable colours that have contained all the living and non-living in her lap. But also we on the earth

God has provided his power and uniqueness to all in nature. There are many forms in it, which vary from season to season and even minute to minute like the sea appears bright blue in the morning but in the afternoon it looks like a green bee. Hindi poems about nature.

Mother Nature

The sky changes its colour throughout the day, pale pink at sunrise, blue with dazzling eyes during the day, bright orange at sunset, and purple at night. Our nature also changes according to nature like the happy and optimistic sun shining, the rainy and springtime.

We feel heartfelt joy in the moonlight, we feel bored and tired in the strong sunlight.

The environment has some transformative powers that change our nature accordingly.

But Earth has the power to get the patient out of his disease if he is provided with the necessary and pleasant environment.

Nature is very important for a healthy life, so that is why we should preserve it for ourselves and for the next generation. so we should not cut down trees and forests, so we should not harm the ocean, river, and ozone layer by our wrong actions, Yet not increase the greenhouse gas, and harm the environment because of our personal interests Do not forget to should our Post

We should be fully aware of our nature and try to maintain it so that life on earth is always possible.

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पढ़ने के लिए धन्यवाद


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